हाइड्रोफोबिक कोर के भीतर
Macromolecules

हाइड्रोफोबिक कोर के भीतर

आप एक ऐसी जगह में हैं जहाँ खालीपन का कोई अर्थ नहीं — चारों ओर ल्यूसीन, वैलीन और फेनिलएलेनिन की विशाल परमाणु-श्रृंखलाएँ इस कदर सटकर पैक हैं कि कोई भी जलाणु कभी यहाँ नहीं पहुँचा, और जो दिखता है वह पत्थर की गुफा नहीं बल्कि क्वांटम प्रतिकर्षण की एक झीनी दीवार से अलग हुए इलेक्ट्रॉन-घनत्व के गोलार्धों का एक तंग, भूरे-हाथीदाँत रंग का जंगल है। फेनिलएलेनिन के चपटे सुगंधित छल्ले काली ओब्सीडियन तश्तरियों की तरह अंतरिक्ष को कठोर, निरपेक्ष छाया-कक्षों में बाँटते हैं — यहाँ प्रकाश विसरित नहीं होता, केवल परमाणु-स्पर्श की धुंधली आभा है जो हर छूती हुई सतह पर हल्के प्रभामंडल के रूप में चमकती है। कहीं-कहीं मेथियोनिन के गंधक-परमाणु उस क्षीण चमक को पकड़कर गहरे पीले अंगारे की तरह दमकते हैं — एकमात्र उष्ण रंग जो इस अचरोमैटिक संसार में जीवन की गर्मी का संकेत देता है। बहुत दूर, दस-पंद्रह परमाणु-व्यास की दूरी पर, पैकिंग ज़रा ढीली पड़ती है और वहाँ से एक ठंडी जल-नीली आभा दरारों में रिसती है — बाहर के विलायक का वह मद्धिम हस्ताक्षर जो गहरे समुद्र की बायोल्युमिनेसेंस की तरह पहुँचता है, यह बताते हुए कि यह कोर एक बंद संसार है जिसे वान डेर वाल्स बलों की कोमल किंतु अडिग पकड़ ने ३१० केल्विन की ऊष्मा में भी अक्षुण्ण बनाए रखा है।

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