उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर की गहराइयों में, जहाँ सूर्य की एक भी किरण नहीं पहुँचती, ROV की तीव्र रोशनी में *Aphrocallistes vastus* की काँचनुमा मीनारें एक डूबे हुए गिरजाघर के शिखरों की भाँति उठती दिखती हैं — उनका षट्कोणीय सिलिका जाल भीतर से प्रकाशित होकर हाथीदाँत और琥珀रंगी आभा बिखेरता है, मानो किसी मध्यकालीन शिल्पी ने काँच में ही नक्काशी की हो। ये शैलें, जो हेक्सैक्टिनेलिड स्पंज की फ्यूज़्ड स्पिक्यूल संरचनाओं से निर्मित हैं, प्रति वर्ष केवल कुछ मिलीमीटर बढ़ती हैं और अपने भीतर से प्रतिदिन अपने शरीर के आयतन का बीस हज़ार गुना जल छानती हैं, जबकि उनके जालीदार कक्षों में ब्रिटल स्टार अपनी लचीली भुजाएँ लपेटे विश्राम करते हैं। तलछट पर बिखरे काँच के सूक्ष्म शूल हीरों की तरह चमकते हैं, और बीच में मँडराती समुद्री हिम-कण परम शांति से नीचे उतरते हैं, जबकि दूर अँधेरे के छोर पर एक नीली-हरी जैवदीप्ति की लकीर क्षण भर को प्रकट होकर अदृश्य हो जाती है। यह दृश्य पृथ्वी की सबसे प्राचीन जैविक विरासत का मूक साक्षी है — वह संधि-बिन्दु जहाँ एककोशिकीय कोएनोफ्लैजिलेट और बहुकोशिकीय पशु-जीवन के बीच की सीमारेखा धुँधली पड़ जाती है।
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