समुद्र की मेसोपेलैजिक संधि-छाया में, ऊपर की ओर दृष्टि डालते हुए, एक त्यक्त लार्वेशियन गृह — श्लेष्म झिल्ली का वह नाजुक गुब्बारा जो किसी सूक्ष्म प्राणी ने घंटों में बुना और फिर पल भर में छोड़ दिया — धीरे-धीरे नीचे की ओर डूबता दिखता है, जैसे कोई भूत-जहाज का पाल अपने-आप सिमट रहा हो। इसकी झिल्ली, जो कभी चालीस सेंटीमीटर का पारदर्शी गोला थी, अब असमान रूप से सिकुड़ रही है — एक ओर की सतह अभी भी गुंबद की आकृति बनाए हुए है जबकि दूसरी ओर धीमी, सुरुचिपूर्ण सिलवटों में भीतर की ओर धँसती जा रही है, और जहाँ झिल्ली तनी हुई है वहाँ नीचे से आते इंडिगो प्रकाश के अपवर्तन से साबुन के बुलबुले-सी इंद्रधनुषी बैंगनी-सुनहरी-फ़िरोज़ी धारियाँ कंपित होती हैं। जहाँ भीतर कण जमा हो गए हैं, वहाँ झिल्ली दूधिया-पीतवर्णी अपारदर्शिता में बदल गई है — जैव मलबे की परतें जो इस संरचना को कार्बन का एक डूबता हुआ पैकेज बना देती हैं, समुद्र के जैव-भू-रासायनिक चक्र में एक मौन योगदान। झिल्ली के किनारे पर प्रकाश का एक नीला-श्वेत प्रभामंडल छाया हुआ है — विवर्तन का वह प्रेतवत मुकुट जो इस डूबते ढाँचे को क्षण भर के लिए एक गिरे हुए चंद्रमा का आभास देता है — और उसके ऊपर की छलनी-जाली पर एक मिलीमीटर से भी छोटे कोपेपॉड अपने पारभासी शरीरों से मँडराते हैं, उनकी ताँबई आँखें ही उन्हें इस नील जल में प्रकट करती हैं, जैसे वे जानते हों कि यह भोज क्षणिक है।