श्लेष्म से ग्लाइकोकैलिक्स की ओर
Viruses

श्लेष्म से ग्लाइकोकैलिक्स की ओर

आप एक ऐसे संसार में तैर रहे हैं जहाँ हर दिशा से हरे-सुनहरे म्यूसिन के मोटे, रस्सी-जैसे तंतु आपको घेरते हैं — एक अनियमित त्रि-आयामी जाल जिसमें कुछ छिद्र खुले गलियारों जैसे लगते हैं और कुछ इतने संकरे हैं कि तापीय ऊर्जा से उत्पन्न ब्राउनी झटके आपको उनकी चिपचिपी दीवारों से टकरा देते हैं, हर स्पर्श पर एक क्षणिक नारंगी-अम्बर आभा उभरती है और फिर बिखर जाती है। यह श्वासनली की श्लेष्मा है — ग्लाइकोप्रोटीन श्रृंखलाओं का एक जलयोजित बहुलक नेटवर्क जिसके छिद्र 100 से 500 नैनोमीटर चौड़े हैं, और आपका विषाणु-आकार का अस्तित्व इस जंगल में उद्देश्यहीन रूप से धकेला और खींचा जाता रहता है, क्योंकि इस स्केल पर जल अणुओं की तापीय टक्करें गुरुत्वाकर्षण से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। तीस से चालीस शरीर-लंबाई दूर, उपकला कोशिका की सतह एक विशाल घुमावदार ग्रह-भित्ति की तरह उभरती है, जिसके गहरे टील-रंग के लिपिड द्विस्तर से असंख्य ग्लाइकान शृंखलाएँ एक घने वन की भाँति ऊपर उठती हैं — सियालिक अम्ल के गुच्छों से सुशोभित उनके शीर्ष गुलाबी-मैजेंटा फॉस्फोरेसेंस में दमकते हैं, जैसे किसी दूसरे जगत की दहलीज़ पर जलते दीप। यही ग्लाइकोकैलिक्स वह प्रथम आणविक वन है जिसे पार किए बिना कोई भी विषाणु अपने लक्ष्य — कोशिका की झिल्ली — तक नहीं पहुँच सकता, और इस यात्रा में समय नहीं, केवल संयोग और ऊष्मागतिकी शासन करती है।

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