कण क्षितिज अग्निगोला ढाल
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कण क्षितिज अग्निगोला ढाल

अवलोकन की समस्त सीमाओं की ओर दृष्टि डालते हुए, आप एक ऐसे शून्य में स्थित हैं जो इतना गहरा और मखमली काला है कि वह स्वयं एक पदार्थ-सा प्रतीत होता है — और उस अंधकार में ब्रह्मांडीय सूक्ष्मतरंग पृष्ठभूमि की बहुत हल्की, दानेदार झिलमिलाहट बिखरी है, गहरे बरगंडी और मंद नीले धब्बों के रूप में, जो उन प्राचीनतम फोटॉनों की स्मृति हैं जो ब्रह्मांड के मात्र तीन लाख अस्सी हज़ार वर्ष की आयु में उत्सर्जित हुए थे और तब से तेरह अरब प्रकाश-वर्ष की यात्रा कर आपके पास पहुँचे हैं। धीरे-धीरे, सभी दिशाओं से एक साथ, वह अंधकार एक परिवर्तन में घुलने लगता है — पहले जंग-सी लाली, फिर नारंगी, फिर गंधक-पीली चमक, और अंत में एक दहकता हुआ नीला-श्वेत आवरण जो न तो ज्वाला है और न आकाश, बल्कि वह अवस्था है जब प्रकाश स्वयं पारदर्शी नहीं था — आदिम प्लाज़्मा का वह युग जब ब्रह्मांड अपारदर्शी था और एक भी फोटॉन स्वतंत्र रूप से नहीं चल सकता था। यह ढाल स्थिर है, काँपती नहीं, जैसे किसी भौतिक नियम को आग में ढाल दिया गया हो — और हर दिशा में एक जैसी बंद, एक जैसी दीप्तिमान, यह अनुभव कराती है कि प्रकाश यहाँ संदेशवाहक नहीं, बल्कि स्वयं सृष्टि की वास्तुकला है।

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