गुफा ओस्ट्राकोड हेडलैंप की रोशनी में
Micro-crustaceans

गुफा ओस्ट्राकोड हेडलैंप की रोशनी में

अँधेरे की उस अतल गहराई में, जहाँ प्राकृतिक प्रकाश का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, एक तीखी हेडलैम्प की किरण तिरछी उतरती है और चूना-पत्थर की पीली-सफ़ेद बजरी पर एक जीव को रोशन करती है — *Pseudocandona* — एक स्टाइगोबिटिक ओस्ट्राकोड, जिसका हाथी-दाँत जैसा निर्वर्णित कवच इस भूमिगत धारा के शाश्वत अंधकार में लाखों वर्षों के विकास की परिणति है। यह जीव मात्र एक मिलीमीटर से भी छोटा है, फिर भी उसके खुले कवच की दरार से निकले संवेदी रोम — एस्थेटास्क — बजरी पर इतनी बारीक छायाएँ खींचते हैं जैसे किसी सुई की नोक से रेखाएँ उकेरी गई हों; ये रोम ही उसकी आँखें हैं, उसके कान हैं, पत्थर की भूगर्भीय निस्तब्धता में स्पंदन को पकड़ने का एकमात्र माध्यम। धारा के नीचे सफ़ेद जीवाणु-मैट एक मखमली कालीन की तरह बिछी है और ऊपर छत पर जल की सतह एक काँपता हुआ चाँदी का दर्पण बनाती है, जबकि फ़्रेम के कोने में एक और निर्वर्णित एम्फ़िपॉड — उतना ही पीला, उतना ही नेत्रहीन — इस पाले हुए संसार से चिपका है। किरण की सीमा के पार सब कुछ तत्काल और पूर्णतः काला हो जाता है — यह अँधेरा केवल अनुपस्थिति नहीं, एक ठोस भौतिक उपस्थिति है — और हमारा समस्त ब्रह्मांड सिमटकर इस एक प्रकाश-शंकु में, इस एक श्वेत जीव की संवेदी रोम की थरथराहट में समा जाता है।

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