चारों ओर जो दुनिया है वह न वायु है, न जल — यह एक सजीव, हरे रंग में दमकता हुआ विस्कोइलास्टिक संघनन है, जिसमें G3BP1 प्रोटीनों की सघन जाली से उत्पन्न पन्ना-हरी दीप्ति हर दिशा से एक साथ उठती प्रतीत होती है, बिना किसी एकल स्रोत के, केवल गहराई-पर-गहराई की कोमल चमक। यह स्ट्रेस ग्रैन्यूल एक तरल-तरल फेज़ सेपरेशन की देन है — जब कोशिका ऊष्मा, ऑक्सीडेटिव तनाव या वायरल संक्रमण जैसी विपत्तियों का सामना करती है, तब RNA-बंधक प्रोटीन एक दूसरे के साथ कमज़ोर, बहुसंयोजी अंतःक्रियाओं द्वारा साइटोप्लाज़्म से अलग होकर इन झिल्लीविहीन बूँदों में समा जाते हैं। निकट और दूर, mRNA-प्रोटीन के गुच्छे हल्के-सफ़ेद-हरे केंद्रों के रूप में उभरते हैं, उनकी सीमाएँ धुंधली और कंपायमान, जबकि TIA1 से भरे उष्ण अंगार-नारंगी गोले उस हरी धुंध में अंगारों की तरह तिरते हैं — दो सहअस्तित्वी घनीभूत अवस्थाएँ, द्रव से द्रव स्पर्श करती हुईं। और क्षितिज पर, संघनन की सीमा एक नाटकीय दीवार की तरह खड़ी है — वह हरी सघनता एकाएक समाप्त हो जाती है, एक साबुन की झिल्ली-सी काँपती सतह के पार, विरल और लगभग अंधेरे साइटोप्लाज़्म में, जहाँ यह चमकता हुआ संसार किसी और ही अस्तित्व की देहरी पर आकर रुक जाता है।
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