सामने फैला यह विशाल परिदृश्य किसी मरुस्थली महाद्वीप जैसा प्रतीत होता है — वास्तव में यह एक सूखे हुए काई के पत्ते की सतह है, जिसकी कोशिका-भित्तियाँ शहद-सुनहरी रोशनी में प्राचीन मिट्टी के खंडहरों की तरह धँसी और सिकुड़ी पड़ी हैं। तिरछी, नारंगी आभा लिए हुए प्रकाश की लकीरें इस झुर्रीदार क्यूटिकल पर रेंगती हैं, जहाँ एक पूरी तरह निर्मित टन — 200 माइक्रोमीटर का संकुचित, अपारदर्शी बैरल — अपनी संकेंद्री वलयों में बंद होकर निश्चल पड़ा है, जैसे किसी सूखे फल की त्वचा पर लकीरें उभर आई हों। यह टार्डिग्रेड अनहाइड्रोबायोसिस की अवस्था में है — एक जैविक चमत्कार जिसमें जीव अपने शरीर का लगभग सारा जल त्यागकर, कोशिकाओं को ट्रेहैलोज़ शर्करा की काँच-सदृश परत में संरक्षित कर, दशकों तक निर्जीव-सा पड़ा रह सकता है। उसके ठीक बगल में एक दूसरा टार्डिग्रेड अभी इसी संकुचन की प्रक्रिया में है — पिछले चार जोड़ी पैर अर्ध-समेटे, देह के किनारों पर पहली झुर्रियाँ उभरती हुईं, मुखद्वार का क्षेत्र अभी थोड़ा-सा आर्द्र और पारभासी — और चारों ओर फफूँद के बीजाणु तथा खनिज धूल के क्रिस्टल धीमे-धीमे इस सूखे, स्थिर, अनंत-सी लगती दुनिया में बिखरते हैं।