जालिकापाद गमन, कण पारगमन
Foraminifera

जालिकापाद गमन, कण पारगमन

हरे-सुनहरे प्रकाश में डूबी इस दुनिया में आप एक विशाल हिमनद-सी सतह के ठीक ऊपर मँडरा रहे हैं — यह सतह वास्तव में एक धुँधले क्वार्ट्ज़ कण की है, जिसके भीतर उथले समुद्र का बिखरा हुआ सूर्यप्रकाश लाखों सूक्ष्म पहलुओं से होकर गुज़रता है और ठंडे श्वेत व हल्के अंबर रंग के तारों की तरह चमकता है, हर दरार और खरोंच एक पर्वत-श्रेणी की तरह विशाल दिखती है। इस भूदृश्य के केंद्र में Rosalina globularis अपने छः-कक्षीय चपटे सर्पिल कवच के साथ राज करती है — पारदर्शी अंबर-हरे हायलाइन कैल्साइट का वह कोमल गुंबद भीतर से प्रकाशित होता है जैसे किसी रंगीन काँच की खिड़की से सूरज छनता हो, और हर कक्ष में कोशिकाद्रव्य की छाया गहरे केंद्र से हल्के बाहरी छोर तक क्रमशः धुँधली होती जाती है। उसके नीचे और चारों ओर रेटिकुलोपोडिया का जीवित जाल फैला है — स्वर्णिम रेशमी तंतुओं का वह अनवरत बुना हुआ कालीन, जो हर क्षण जुड़ता और बिखरता रहता है, कण की सतह से चिपककर जीव को धीरे-धीरे आगे खींचता है, प्रत्येक तंतु इतना पतला कि मकड़ी का जाला भी मोटा लगे। पीछे छूटते तंतु क्वार्ट्ज़ की सतह पर श्लेष्म के भूत-धागे छोड़ जाते हैं जो बदलते प्रकाश में बैंगनी से सुनहरे और हरे रंग में इंद्रधनुषी आभा बिखेरते हैं, जबकि दूर पानी का स्तंभ एक नीले-हरे कोहरे में घुल जाता है — यह याद दिलाते हुए कि इस एकल कोशिका के ऊपर असीम महासागर की गहराई है।

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